यक्षिणी साधना और मंत्र सिद्धि: सफलता के लिए सात्विक चिंतन और ओरा का महत्व
साधना जगत में सफलता केवल मंत्र जप से नहीं, बल्कि साधक के आंतरिक व्यक्तित्व और उसके चिंतन (Thought Process) से निर्धारित होती है। चाहे आप यक्षिणी साधना कर रहे हों या किसी अन्य शक्ति की उपासना, आपका मानसिक धरातल ही आपकी सफलता की नींव रखता है।
1. सात्विक चिंतन और ओरा (Aura) का विज्ञान
साधना के दौरान साधक का चिंतन पूर्णतः सात्विक होना अनिवार्य है। जब एक सामान्य स्त्री आपकी दृष्टि को देखकर आपके मन के भाव समझ लेती है, तो अपार शक्ति संपन्न यक्षिणी से आपके मनोभाव कैसे छिप सकते हैं?
ओरा (Aura) क्या है? हमारे मन में जैसे विचार होते हैं, वैसा ही हमारे शरीर के चारों ओर एक सूक्ष्म ऊर्जा मंडल बन जाता है, जिसे 'ओरा' कहते हैं।
तामसिक भाव का प्रभाव: यदि मन में विकार या नकारात्मकता है, तो ओरा गहरे धूसर (Dark Grey) रंग का हो जाता है।
नकारात्मक तरंगें: इस धूसर ओरा से निकलने वाली किरणें संवेदनशील शक्तियों को असुरक्षा का अहसास कराती हैं, जिससे वे साधक के समक्ष प्रकट होने में संकोच करती हैं।
मुख्य बात: साधना का मूल उद्देश्य मन को भ्रमजाल से मुक्त कर, विकारों पर विजय प्राप्त करना और आत्मिक रूप से स्वतंत्र होना है।
2. विचार: एक मौन वार्ता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा
क्या आप जानते हैं कि आपका चिंतन वास्तव में एक मौन वार्ता (Silent Communication) है?
रोम-छिद्र और संचार: जैसे मुख से निकले शब्द ईथर (Ether) में परिवर्तित होकर ब्रह्मांड की यात्रा करते हैं, वैसे ही हमारे शरीर का प्रत्येक रोम-छिद्र एक मुख की भांति कार्य करता है।
कल्पना से साकार तक: साधना के माध्यम से हम अपने 'कल्पना योग' को 'साकार योग' में बदलते हैं। साधक जिस रूप में अपने इष्ट का ध्यान करता है, वही ऊर्जा भविष्य में प्रत्यक्ष रूप धारण करती है।
3. मंत्र की शक्ति और सद्गुरु का महत्व
मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं है। जब सद्गुरु अपने प्राणों की ऊर्जा से घर्षित कर शिष्य को मंत्र प्रदान करते हैं, तो वह एक दिव्यास्त्र बन जाता है।
मंत्र सिद्धि में देरी क्यों होती है?
अक्सर साधक शिकायत करते हैं कि मंत्र का प्रभाव नहीं दिख रहा। इसका कारण प्रारब्ध का आवरण है।
शुरुआत में प्रारब्ध के कारण मंत्र की शक्ति ढकी रहती है।
जैसे-जैसे जप की एकाग्रता और समय बढ़ता है, यह आवरण शिथिल होने लगता है।
अंत में, मंत्र पूर्ण दैदीप्यमान होकर साधक की मनोकामना पूर्ण करता है।
सूत्र: जितना अधिक जप, सफलता उतनी ही करीब।
4. नकारात्मकता: सफलता के मार्ग में बाधक
जैसे दूध से भरे पात्र को फटने के लिए नींबू की एक बूंद काफी है, वैसे ही साधना के दौरान एक छोटा सा नकारात्मक विचार आपकी पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है।
आकर्षण बल (Attraction Force): आपके मंत्र ईथर के माध्यम से शक्तियों को आकर्षित करते हैं। नकारात्मक चिंतन इस आकर्षण बल को कमजोर कर देता है।
दृढ़ संकल्प: सफलता के लिए आत्मविश्वास से लबालब और सकारात्मक चिंतन अनिवार्य है।
निष्कर्ष: साधना पथ पर सफलता का मंत्र
यक्षिणी साधना या किसी भी उच्च स्तरीय साधना में सफलता तभी संभव है जब साधक:
मन पर पूर्ण संयम रखे।
सकारात्मक चिंतन को ढाल बनाए।
सफलता का दृण संकल्प लेकर आगे बढ़े।
साधना में सफलता के 3 स्तंभ: स्थिरता, गुरु-मुख मंत्र और पुरश्चरण का विज्ञान
अध्यात्म और साधना की डगर पर चलने वाले हर नए साधक के मन में कई प्रश्न होते हैं। क्या केवल मंत्र जप पर्याप्त है? साधना में मन क्यों भटकता है? 'शत्रुकुल' मंत्र क्या होते हैं? इस लेख में हम साधना की सफलता से जुड़े इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. साधना में शारीरिक और मानसिक स्थिरता का महत्व
साधना के प्रारंभ में अक्सर साधक अति-उत्साहित होते हैं, जिससे उनकी श्वास-प्रश्वास (Breathing) की गति तीव्र हो जाती है। तंत्र और योग शास्त्र के अनुसार, श्वास की गति का सीधा संबंध मन से है।
विचलित मन और ध्यान बिम्ब: यदि श्वास तीव्र है, तो मन स्थिर नहीं होगा। मन स्थिर न होने पर इष्ट देव की जो छवि (Image) हम मन में स्थापित करते हैं, वह बार-बार टूटती रहती है। जब ध्यान का बिम्ब ही स्थिर नहीं होगा, तो मंत्र सिद्धि संभव नहीं है।
मुद्रा और ऊर्जा का संरक्षण: साधना के समय सिद्धासन, सुखासन या पद्मासन में बैठकर 'ध्यान मुद्रा' (अंगूठे और तर्जनी का मिलन) बनानी चाहिए। इससे शरीर की ऊर्जा का बाहर गमन नहीं होता।
मूलबंध का अभ्यास: आसन के दौरान मूलबंध लगाने से शरीर स्थिर होता है और साधक लंबे समय तक जप कर पाता है।
2. मंत्र कार्य कैसे करता है और गुरु का महत्व?
मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म शक्ति है। शास्त्रों के अनुसार, मंत्र का चयन कभी भी केवल पुस्तकों को देखकर नहीं करना चाहिए।
गुरु-मुख मंत्र: जब एक समर्थ गुरु अपने प्राणों से घर्षित मंत्र शिष्य को प्रदान करते हैं, तो वह 'सिद्ध' होने की क्षमता रखता है। गुरु मंत्र की सही ध्वनि, आरोह-अवरोह (उच्चारण का उतार-चढ़ाव) समझाते हैं।
मानसिक आज्ञा: यदि आप गुरु के पास शारीरिक रूप से नहीं पहुँच सकते, तो उनकी छवि का ध्यान कर मानसिक आज्ञा लेकर ही साधना प्रारंभ करनी चाहिए।
दोष निवारण: गुरु यह सुनिश्चित करते हैं कि मंत्र में कोई मात्रा या वर्ण दोष न हो, जिससे साधक को हानि न हो।
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3. मंत्रों का 'शत्रुकुल' और चयन की जटिलता
अध्यात्म में शत्रुकुल मंत्र का अर्थ उन मंत्रों से है जो साधक की राशि, नक्षत्र या तत्व के अनुकूल नहीं होते।
तत्वों का मेल: मंत्र का तत्व और साधक के नामांक का तत्व मित्र, शत्रु या तटस्थ हो सकते हैं। यदि गलती से शत्रु मंत्र का चयन कर लिया जाए, तो वह साधक को लाभ के बजाय मानसिक या शारीरिक कष्ट दे सकता है।
गुरु का कवच: गुरु इन समस्त जटिल गणनाओं (राशि, नक्षत्र, तत्व मेल) के ज्ञाता होते हैं। इसलिए गुरु द्वारा दिया गया मंत्र हमेशा 'निर्भय' और 'सफल' होता है।
नोट: अष्टादश (18) सिद्ध विद्याओं को छोड़कर अन्य देवी-देवताओं के मंत्रों में इन नियमों का पालन अनिवार्य माना गया है।
4. मंत्र पुरश्चरण: सिद्धि का अंतिम सोपान
अक्सर साधक पूछते हैं कि पुरश्चरण (Purashcharan) क्या है?
सरल शब्दों में, गुरु द्वारा निर्धारित एक निश्चित जप संख्या को विशेष समय सीमा और नियमों के साथ पूर्ण करना ही पुरश्चरण है।
संयमित जीवन: पुरश्चरण की अवधि में साधक को सामाजिक दूरी और पूर्ण ब्रह्मचर्य या सात्विकता का पालन करना होता है।
अनुशासन: यह प्रक्रिया साधक की संकल्प शक्ति को बढ़ाती है और ब्रह्मांडीय शक्तियों को मंत्र के अधीन खींचने का कार्य करती है।
निष्कर्ष
साधना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यदि आपका शरीर स्थिर है, मंत्र गुरु-प्रदत्त है और आप संकल्पित होकर पुरश्चरण करते हैं, तो ब्रह्मांडीय शक्तियाँ आपको सफलता का वरदान अवश्य देती हैं।
- पुरश्चरण के पांच अंग होते हैं-
जप-इसमें मंत्र के देवी या देवता का विधिवत पंचोपचार या षोडशोपचार से पूजन किया जाता है,इन उपचारों के अतिरिक्त देवता पूजन का विशेष क्रम तांत्रिक साधना में किया जाता है.
भूमि शोधन-साधना कक्ष के स्थान का पूजन भूमि शोधन कहलाता है.द्वार देवताओं का पूजन कर धरती को अर्ध्य प्रदान करे,फिर आसान शोधन मंत्र से भूमि पर पुष्प,अक्षत आदि अर्पित कर आसान बिछाए और उस पर बैठे.
देह शोधन-साधक प्राणायाम संपन्न करता है,फिर भूत शुद्धि,मातृकाओं से न्यास, अपने इष्ट मन्त्र आर ऋष्यादिन्यास,करन्यास आदि संपन्न करने से साधक का शरीर शुद्ध हो जाता है .
द्रव्यदिशोधन-साधक की साधना का अनिवार्य अस्त्र होती है उसकी साधना सामग्री,इसमें साधना में प्रायोजित सभी सामग्री जैसे, यन्त्र, माला,पुष्प,दीप,धुप,वस्त्र आदि सभी सामग्री आ जाती है.इनका पूर्ण रूपेण मन्त्रों केर द्वारा शोधन किया जाता है तत्पश्चात आगे की क्रिया की जनि चाहिए.(द्रव्यशोधन एक अनिवार्य और लंबी साधनात्मक क्रिया है जिसका पूर्ण साधनात्मक विवरण इसी पत्रिका में अन्यत्र दिया जा रहा है)
माला पूर्ण रूपेण संस्कारित होना चाहिए ,असंस्कृत माला से जप करने पर सफलता तो मिलती नहीं उलटे मानसिक तनाव की अप देवताओं के द्वारा प्राप्ति होती है वो भी मुफ्त में.यदि जप काल में साधक अखंड दीपक प्रज्वलित कर ले तो कही ज्यादा अनुकूल रहता है.और यदि ऐसा न हो सके तो कम से कम जप काल में दीपक न बुझने पाए ऐसी व्यवस्था कर लेनी चाहिए.
होम-नित्य प्रति के जप का दशांश हवन नित्य यदि कर दिया जाये तो उचित होता है ,कई व्यक्ति हवन के बदले दशांश जप कर लेते हैं , पर मेरे मतानुसार हवन करना कही ज्यादा अनुकूल और लाभदायक होता है.क्योंकि हवन करने से मंत्र दीप्त होता है और उसमे विशेष चैतन्यता आती है.
तर्पण-हवन करने के बाद बड़े से ताम्बे के बर्तन में या किसी सरोवर में हवन की मात्र का दशांश तर्पण करे. बर्तन को अष्टगंध,कपूर ,दूर्वा आदि मिश्रित जल से पूरित कर दे और जो भी देवता या देवी हो उसका नाम लेकर ‘तर्पयामि नमः’ कह कर जल अर्पित करें.
मार्जन-तर्पण के बाद उसकी दशांश संख्या से सरोवर में खड़े होकर अपने सिर पर दूर्वा द्वारा कुम्भ मुद्रा से देवता का नाम लेकर “अभिषिन्चामि नमः’ कहकर जल का अभिषेक करें.
उसी दिवस या अंतिम दिवस ब्राम्हण भोज और कुमारी भोज का आयोजन करे.
तत् पश्चात अपनी साधना की पूर्णता प्राप्ति के लिए गुरु के श्री चरणों में प्रार्थना ज्ञापित करे. यदि कोई इस प्रकार का क्रम साधना में अपनाता है तो उसे निश्चय ही अनुकूलता मिलती ही है.
किन स्थानों पर साधना करने से यक्षिणी साधना में शीघ्र सफलता मिलती है ?
सिद्धपीठों,गुरु गृह,नदी तट,पर्वत शिखर,एकांत वन ,विल्व या पीपल वृक्ष के नीचे, साधना करने से सफलता शीघ्र ही मिलती है. इस साधना को यदि कामाख्या पीठ के सौभाग्य कुंड या प्रांगण में संपन्न किया जाये या फिर अलकापुरी में या पचमढ़ी ,माउन्ट आबू ,हिडिम्बा मंदिर आदि स्थानों पर साधना करने से कही ज्यादा अनुकूलता मिलती है. यदि ऐसा संभव ना हो पाए तो घर में भी ये साधना की जा सकती है .पर साधना काल के मध्य कोई और उस कमरे में ना जाने पाए.
इस साधना में सौभाग्य कुण्ड की क्या महत्ता है ?
यदि साधक यक्षिणी साधना के प्रारंभ में “ ॐमम सर्व मनोरथान पूर्णार्थे अस्य सौभाग्य वारिः पूर्ण यक्षिणी सिद्धये नमः” बोलकर २१ बार जल का तर्पण का माँ कामाख्या से करता है तो उसे सफलता की प्राप्ति होती ही है.ये क्रिया सिर्फ सौभाग्य कुण्ड में ही हो सकती है.इस प्रकार की साधनाओं में उस स्थल की अपनी अलग महत्ता और प्रभाव है.
साधक का आहार क्या होना चाहिए ?
साधक को यथा संभव अत्यधिक तिक्त या अत्यधिक मधुर भोजन ना करके शुद्ध सात्विक आहार का प्रयोग साधना काल में करना चाहिए यदि हविष्यान्न का प्रयोग किया जाये तो और बेहतर है. इसके अतिरिक्त भूमि शयन,पूर्ण मानसिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य का पालन भी किया जाना चाहिए.
यक्षिणी साधना में मंत्रजाप के पूर्व क्या कोई विशेष क्रिया कर लेनी चाहिए ?
यदि साधक यक्षिणी मंत्र के पहले ‘स्त्रीं’ का जप अपने विशुद्ध चक्र पर ध्यान लगाकर और उसका स्पर्श करके १० बार कर ले तो उचित है.तथा मंत्र जप के पूर्व ‘ओम’ का १० बार उच्चारण भी कर लेना चाहिए.प्रत्येक यक्षिणी साधना के पूर्व पूर्णिमा को पूर्ण पवित्र होकर शुद्ध चित्त से ११ दिनों तक महामृत्युंजय मंत्र का ५००० जप अवश्य संपन्न कर लेना चाहिए.और इसके साथ नित्य प्रति कुबेर मंत्र की भी तीन माला संपन्न करनी चाहिए.ये एक अनिवार्य कर्म है ,अधिकांश साधक साधना को सिर्फ खानापूर्ति मानते हैं,जितना जप बताया है ,उतना कर लिया और गिनती गिनते गए और कह दिया की भाई मैंने तो मंत्र जप किया था, न तो शुचिता –अशुचिता का ध्यान रखा और न ही अपने मनोभावो को और अपने दृष्टिकोण को परखा.बस मुह उठाकर कह दिया की भाई साधना-वाधना सब बकवास है.यक्षिणियों के अधिपति कुबेर होते हैं.और यदि आप अधिपति को ही प्रसन्न नहीं कर पाएंगे तो बगैर उनकी अनुमति के क्यूँकर कोई यक्षिणी आपका अभीष्ट साधने आएगी.इसी प्रकार भगवान मृत्युंजय की उपासना और मन्त्र से ही कुबेर सिद्धि का द्वार खुलता है और वे प्रसन्न होकर आपका मनोरथ पूर्ण करते हैं. यदि वर्ष में मात्र एक बार गुरु पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक किसी भी विल्व-वृक्ष के नीचे बैठ कर भगवान शिव का पूर्ण षोडश उपचारों से पूजन और अभिषेक करने के बाद उत्तराभिमुख होकर मृत्युंजय मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से करे.तत्पश्चात निम्न कुबेर-मन्त्र की ३ माला जप करे –
ॐ यक्षराज नमस्तु शंकरप्रिय बांधव,एकां मे वशगां नित्यं यक्षिणीम् कुरु ते नमः.
ठीक इसी प्रकार से पूर्ण रूप से कुबेर साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए कुबेर की शक्ति कुबेर यक्षिणी मंत्र की भी एक माला नित्य करनी चाहिए ,वैसे कुबेर यक्षिणी को प्रत्यक्ष करने और उनका अनुग्रह प्राप्त करने का अपना एक विशेष विधान होता है परन्तु अन्य यक्षिणियों की साधना और कुबेर साधना में सफलता प्राप्ति के निमित्त भी इस साधना के मंत्र की १ माला कुबेर मन्त्र के साथ होनी ही चाहिए.इसके प्रभाव स्वरुप जहाँ आर्थिक अनुकूलता प्राप्त होती है वही यक्षिणी के पूर्ण साहचर्य की प्राप्ति हेतु कुबेर देव की कृपा भी मिलती है-
ॐ कुबेर यक्षिण्यै धन धान्य स्वामिन्यै धन धान्य समृद्धि में देहि दापय स्वाहा
इसके बाद मूल यक्षिणी साधना प्रारंभ करना चाहिए ,और हो सके तो नित्य कुमारी पूजन करना चाहिए.
यक्षिणी कितने प्रकार की होती हैं,और इनके कितने प्रकार होते हैं ?
यक्षिणी के कई वर्ग होते हैं,ये अलग अलग पांच तत्वों से सम्बंधित होती हैं और इनमे उसी तत्व विशेष के अनुसार शक्ति होती हैं.जैसे कोई रसायन क्षेत्र का ज्ञान देती है तो कोई निधि दर्शन और प्राप्ति का सामर्थ्य प्रदान करती है,कोई अतीन्द्रिय लोक का ज्ञान देती है तो कोई पत्नी सुख देती है, किसी के सहयोग से रस्सिद्धि की प्राप्ति होती है तो कोई प्रेम के साथ अतुलनिय संपदा प्रदान करती है. इसी प्रकार विभिन्न वनस्पतियों में भी इनका वास होता है,जैसे-- बिल्व यक्षिणी
- निर्गुण्डी यक्षिणी
- कुश यक्षिणी
- आम्र यक्षिणी
- सहदेवी यक्षिणी
- पिप्पल यक्षिणी
- तुलसी यक्षिणी
आदि पर जब भी इन यक्षिणियों की साधना की जाये तो सम्बंधित वनस्पति के आस पास ही की जानी चाहिए , वैसे बसंत ऋतू और श्रावण मास इनकी साधनाओं के लिए अधिक उपयुक्त होता है ,क्योंकि इस काल में सम्पूर्ण प्रकृति में मानो आपकी सहयोगी हो जाती है. परन्तु ये भी ध्यान रखने योग्य है की जो वनस्पति जिस काल में विकसित होती हैं उसी ऋतू विशेष में उस वनस्पति से सम्बंधित यक्षिणी की साधना करनी चाहिए. उपरोक्त वानस्पतिक यक्षिणियों की शक्ति भी भिन्न भिन्न होती है, जैसे कोई ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री होती है तो कोई अशुभ का निवारण करती है, कोई विद्या प्रदान करती है तो कोई वाक् सिद्धि और राज्य सुख प्रदान करती है.पूर्ण सफलता के लिए प्रायः सभी यक्षिणियों की कम से कम एक माह तक तो साधना करनी ही चाहिए.
क्या मृत्युंजय अभिषेक की भी कोई गोपनीय पद्धति है?
हाँ अवश्य है,यक्षिणी साधना में सफलता के लिए ‘लाकिनीश मृत्युंजय’ की उपासना व अभिषेक किया जाता है.क्यूंकि इनका निवास मणिपूर चक्र में होता है और ये स्थान अग्नि और अमृत दोनों का ही होता है अतः इनका अभिषेक करने से अग्नि की आकर्षण शक्ति आपमें तेज की वृद्धि कर देती है और निसृत अमृत आपको जरा रोगों से मुक्त कर कायाकल्प करता है,और यही तेज व पौरुष बल यक्षिणी को आपकी और खीचता है.इसके लिए पारद शिवलिंग के ऊपर निम्न मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पूर्ण विनम्र भाव से अक्षत अर्पित करे.
ॐ परम कल्याणाय नमः
ॐ विश्वभावनाय नमः,पार्वतीनाथाय,उमाकान्ताय ,विश्वात्मनाय,अविचिन्ताय,गुणाय,निर्गुणाय,धर्माय, ज्ञानमक्षाय,सर्वयोगिनाय,कालरुपाय,त्रैलोक्य रक्षणाय,गोलोकघातकाय,चन्डेशाय,सद्योजाताय,देवाय,शूल धारिणे, कालान्ताय,कान्ताय,चैतन्याय,कुलात्मकाय,कौलाय,चन्द्रशेखराय,उमानाथाय,योगीन्द्राय,शर्वाय,सर्वपूज्याय,ध्यानस्थाय, गुणात्मनाय,पार्वतीप्राणनाथाय,परमात्मनाय.
उपरोक्त नामो के पहले ॐ तथा बाद में नमः लगाकर अक्षत अर्पित करे. इसके बाद मृत्युंजय मंत्र का जप करते हुए कच्चे दूध और जल के मिश्रण से अभिषेक करे.मृत्युंजय मंत्र सदगुरुदेव की पत्रिका में कई बार प्रकाशित हुआ है.
सर्व सामग्री को उत्कीलन करने का क्या विधान है ?
पूजा या साधना में प्रयुक्त सामग्री जैसे,यंत्र,माला,पुष्प,फूल,फल आदि लगभग सभी सभी सामग्रियों का नितांत शुद्ध होना आवश्यक है.यदि इनमे से कोई भी सामग्री में जरा सी भी वैचारिक या स्पर्श की वजह से अशुद्धता आ गयी तो फिर इनके प्रयोग से साधना में कोई लाभ नहीं होता.हम साधना के निमित्त बाजार से पुष्प,फल इत्यादि लेते हैं,अब जिनसे आपने लिया है वो किस शारीरिक या मानसिक स्थिति में थे किसे पता,उन्होंने शंका निवारण के पश्चात हाथों को धोया था या नहीं और कैसी मनः स्थिति में उन्होंने आपको सामग्री दी है,इसी प्रकार पूजा स्थल में यन्त्र माला इत्यादि रखे हैं और उसे घर के बच्चो या अन्य सदस्य ने उठा लिया या स्पर्श कर लिया तब भी उनकी प्राणशक्ति और शारीरिक मानसिक शुचिता से वे साधना सामग्री प्रभावित होंगी ही. रसोई से नैवेद्य बनकर साधना कक्ष में आते आते न जाने किसकी दृष्टि पद जाये या जब भोजन तैयार हो रहा था उस समय बनाने वाले का चिंतन कैसा था.यन्त्र के ऊपर कीट,पतंगे,चूहे,छिपकली आदि के चलने से भी यन्त्र माला इत्यादि दोषपूर्ण हो जाते हैं.अतः ऐसी स्थिति में उन्कपरिहार करने के लिए या उत्कीलन करने के लिए एक विशेष मंत्र का प्रयोग किया जाता है ,जिसे पहले सिद्ध करना अनिवार्य है.
निम्न मंत्र को पहले ५१ माला मंत्रजप करके सिद्ध कर लेना चाहिए,बाद में जब भी आप साधना हेतु सामग्रियों का प्रयोग करे तो इस मन्त्र को १०८ बार जप कर उससे जल को अभिमंत्रित कर सभी सामग्रियों पर छिड़क दे.
मन्त्र-ॐ ह्रीं त्रिपुटि त्रिपुटि कठ कठ आभिचारिक-दोषं कीटपतंगादिस्पृष्टदोषं क्रियादिदूषितं हन हन नाशय नाशय शोषय शोषय हुं फट् स्वाहा.
यक्षिणी साधना के अन्य गोपनीय तथ्य क्या है,जिनका प्रयोग करने से निश्चित सफलता मिल ही जाये ?
यक्षिणी साधना के मूल यंत्र के साथ दो सामग्रियों की और अनिवार्यता होती ही है-- अप्सरा यक्षिणी तंत्र प्रतीक
- निश्चित यक्षिणी सायुज्य पारद गुटिका
इसके अतिरिक्त स्वयं के हाथो से या गुरु के द्वारा निर्मित यक्षिणी का चित्र या विग्रह भी पास में होना चाहिए ,इससे ध्यान में अनुकूलता मिलती है.यक्षिणी साधना में यक्षिणी कीलन की गोपनीय क्रिया भी की जाती है ,इस क्रिया में भोजपत्र या सफ़ेद कागज पर त्रिगंध से यक्षिणी का लघु चित्र या यन्त्र बनाया जाता है और उस चित्र के मध्य में मूल मंत्र लिखा जाता है. यदि आपने यन्ता का अंकन किया है यतो उसके मध्य में मंत्र नहीं लिखना है.अब उस चित्र के चारो और गोलाकार में मंत्र लिखना रहता है .उसका तरीका ये है की पहले मंत्र लिखा फिर मूल मंत्र का पहला अक्षर फिर मंत्र लिखा फिर दूसरा अक्षर इसी प्रकार मंत्र फिर अक्षर फिर मन्त्र फिर अक्षर और अंत में फिर मंत्र लिखा जाता है ,circle वृत्त या गोलाकार रूप में और ये क्रिया साधना के प्रारंभ में की जाती है तथा मंत्र लिखते समय जब आप मंत्र के अक्षरों को लिखते हो तो उस अक्षर पर २१ बार मूल मंत्र को जप कर अनामिका अंगुली का स्पर्श करना चाहिए ,ये क्रम अंतिम अक्षर तक रहता है .ये क्रिया कीलन कहलाती है और इस क्रिया के द्वारा यक्षिणी को साधक अपने मन्त्रों से कीलित या बांध लेता है.और यक्षिणी को प्रत्यक्ष होने और सिद्धि देने के लिए बाध्य होना पड़ता है. ये क्रिया और आगे का पूर्ण जप वीर भाव से ही होना चाहिए वो भी क्रोध मुद्रा में. इसके अतिरिक्त निश्चित यक्षिणी सायुज्य पारद गुटिका को प्राप्त कर उस पर भी मूल मंत्र की ५ माला कर लेना चाहिए जिससे वो गुटिका उस यक्षिणी विशेष से सम्बंधित हो जायेगी.इस गुटिका पर आप अलग अलग कई यक्षिणियों की साधना कर सकते हैं. इसी प्रकार ध्यान के बाद साधना के पूर्व यक्षिणी का आवाहन करने, उन्हें आसन देने ,उन्हें आसान पर बैठने और उनके सान्निध्य के लिए,उन्हें ह्रदय में स्थापित करने के लिए , उनका पूजन करने के लिए तथा जप के उपरांत उनका विसर्जन करने के लिए भी कुछ विशेष क्रिया की जाती है जिनका वर्णन नीचे किया जा रहा है.
इसी प्रकार कुछ मूल मंत्र के अतिरिक्त कुछ विशेष मन्त्रों और मुद्राओं की भी अनिवार्यता होती है.(मुद्राओं के चित्र तो आपको ग्रुप के फाइल सेक्सन में मिल जायेंगे,क्योंकि अभी वेब साईट का कार्य चल रहा है इसलिए उसे कामाख्या कार्य शाला के बाद अपलोड कर दिया जायेगा)
यक्षिणी मुद्रा-क्रोधान्कुशी मुद्रा-जिसके द्वारा सम्पूर्ण विश्व को ही आकर्षित किया जा सकता है.
इस मुद्रा का प्रयोग करके निम्न मंत्र से यक्षिणी का आवाहन करे.
ॐ ह्रीं आगच्छागच्छ अमुक यक्षिणी स्वाहा.
आवाहन के बाद सम्मुखिकरण मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए निम्न मंत्र को उच्चारित करे-
ॐ महा यक्षिणी मैथुन प्रिये स्वाहा.
फिर सान्निध्य करण मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए –
ॐ कामभोगेश्वरी स्वाहा
मंत्र का उच्चारण कर आसन प्रदान करे.इसके बाद दोनों हाथ की मुट्ठी एक साथ बांध कर अपने वक्षस्थल पर रखे और
ॐ ह्रीं हृदयाय नमः
का उच्चारण करे .फिर प्रमुखी मुद्रा अर्थात दोनों हाथ की मुट्ठी बांध कर तर्जनी और मध्यमा अंगुली को फैलाये तथा निम्न मंत्र से यक्षिणी का गंध,पुष्प,धुप,दीप,नैवेद्य आदि से पूजन करे –
ॐ सर्व मनोहारिणी स्वाहा.
सम्पूर्ण जप के पश्चात पुनः आवाहन मुद्रा का ही प्रयोग करते हुए बाये को बाहर की और हिलाते हुए निम्न मंत्र का प्रयोग कर विसर्जन करे, याद रखे आवाहन में दाये अंगूठे को बाहर से अंदर हिलाते हैं और विसर्जन में बाये अंगूठे को अंदर से बाहर .
ॐ ह्रीं गच्छ गच्छ अमुक यक्षिणी पुनरागमनाय स्वाहा
यदि इन क्रियाओं का प्रयोग करने पर भी इन यक्षिणियों का साहचर्य न प्राप्त हो तब क्या करना चाहिए?
वैसे ऐसा संभव नहीं होता है की इन क्रियाओं का प्रयोग किया जाये और आपका मनोरथ सिद्ध न हो ,यदि आपको उपरोक्त मुद्राओं का ज्ञान न हो पा रहा हो तो भी तंत्र रहस्यम केसेट्स में बताई गयी पांच मुद्राओं का १०-१० सेकेंड प्रदर्शन करने से भी अनुकूलता मिलती है .यथादंड,मत्स्य,शंख,अभय और ह्रदय मुद्रा.
उपरोक्त मन्त्र के प्रभाव से जप और पुरश्चरण अवधि पूर्ण होने पर भी यदि हाथ धर्मिता के करण ये शक्तियां सामने नहीं आ रही हो तो –
ॐ बंध बंध हन हन अमुकी हुं मंत्र का ८००० बार जप करे तथा२१ मालाॐ सर्वसिद्धियोगेश्वरी हुं फटमन्त्र की जप करें ,इससे निश्चय ही सफलता की प्राप्ति होगी ही. उपरोक्त सभी क्रियाएँ गोपनीय व दुर्लभ हैं. इनका प्रयोग निश्चित ही कालानुसार करना चाहिए.
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